बुधवार, 28 नवंबर 2018

महामृत्युंजय यन्त्र

This Yantra is for the worship of Lord Shiva, and is extremely powerful. This Yantra is known to relieve one from any dreadful chronic diseases, all sorts of fear and phobia, influence of all evil planets, evil spells, ghosts and spirits. It also bestows fortune, name, fame, wealth and prosperity.
The use and upasana of Maha Mritunjay Yantra is worship of Lord Mahamritunjay Shiva and is most auspicious and bestows the person with wealth, health and happiness, good fortune and fame. Maha Mritunjay Yantra dispels all sort of fears, influence of evil planets,
fear of ghosts accidental death and disease etc.
Maha Mritunjay yantra particularly releives one from all dreadful diseases. The person who perform Pooja of Mahmritunjay Yantra , remains in good health and free from all ailments. Lord Mrityunjay Mahadev is the winner of death. On worshiping Mrityunjay Mahadev one can escape from miseries and troubles of this materialistic world as well as the problems related to inner soul. Lord Mrityunjay Mahadev eats our troubles, tensions, stress as well as our ego. Lord Mrityunjay is the doctor of soul and sentiments. To avoid effects of souls and other calamities, Maha Mritunjay yantra, after Pooja and after being energized, is fixed on the outer Gates of the house.
Beej Mantra for this Yantra  :-
                                     "Tryamabakam Yajamahe Saugandhim Pushti vardhanam
                                      Urvarukmiv Bandhanan mrityor mukhsheevamamritiyat"

शिव महिमा

यजुर्वेद का शत रुद्रिय अध्याय , तैतिरीय आरण्यक - श्वेताश्वेतरोप - निषाद में शिव की परमेश्वर रूप में आराधना  अर्चना की गयी है | पर शिव से कई रूपों में पशु पति का स्वरूप यहाँ निर्दिष्ट नहीं है | पशुव्रत पशु और पाश आदि परिभाषित शब्दों का उल्लेख सर्वप्रथम अथवर्शिरस उपनिषद् में प्राप्त होता है |
                                       कापालिक और पाशुपत :-
महाभारत में महेश्वरो के चार मत बतलाये है - शैव , पाशुपत , काल , दमन और कापालिक | इन चारो सम्प्रदायों के मूल ग्रंथो को शैवागम कहा जाता है | कापालिक साधना के रोमांचकारी रस रहस्य पूर्ण किस्से आम जनता में खूब चर्चित है | कापालिक साधना का अपना एक स्वतन्त्र दर्शन और स्वतंत्र मनोविज्ञान है |
                                                                                कापालिको के बारे में कहा जाता है की हर कापालिक छह मुद्रिकाओ का जानकार होता है | ये छह मुद्रिकाए है - कंठहार , आभूषण , कर्णभूषण, चूड़ामणि , भस्म और यज्ञोपवित | गूढार्थ में ये क्रियाए मनुष्य की आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक प्रवृतियों को चिन्हित करने के वाली मिथकीय साधना है | जिसे विकृत प्रतिको से प्रकट करना हमारी शिच का दरिद्र नमूना नहीं तो और क्या है |
                                                        पशुपति :-
चित्त द्वारा पशु और पति के संयोग को योग कहते है | इसे पति को प्राप्त करने वाले मार्ग को विधि कहा जाता है | साधक को पति पूजा के समय हसना गाना नाचना और विचित्र स्तर निकालना विधि के विधान माने गए है  | दुखो की अत्यधिक निवृति यानि दुखो का एकदम छुट जाना ही दुखांत या मोक्ष है | कुल मिलाकर पाशुपत मत पर कापालिको की सोच का बहुत ज्यादा असर देखने को मिलता है | शैव सिद्धांत सम्मत मूल ग्रन्थ तमिल भाषा में लिखे गए है | इसमें पति पशु और पाश इन तीन तत्वों को माना गया है |  पति का आशय इश्वर है , पशु का अर्थ जीव ( वह अज्ञ और अणु है ) पाश चार प्रकार के मूल कर्म , माया और रोध शक्ति | यही जीव की मुक्तावस्था भी कही जाती है | कश्मीर शैव मत बहुत हद तक अद्वेत वाद  से प्रभावित है |
                                                     शैवागम :-
शैव मत के पर्तिपदक शास्त्र जिन्हें शैवागम कहा जाता है | उपागमो सहित इनकी संख्या करीब दो सौ है इनकी रचना सातवी सदी ईशा पूर्व हो चुकी है | अनुश्रुति के अनुसार शैवागामो का महत्त्व निगम और अर्थश्रुती से कम नहीं है | यह निर्तिवाद  सत्य है की शौव उपासना का हमारे जन जीवन पर व्यापक असर पड़ा है | शेवागामो से प्रेरणा ग्रहण करके कालिदास ने अपने तीनो नाटको के मंगल श्लोक लिखे है | नाटक , नृत्य , शिल्प , वाश्तु वित्त , संगीत शब्द शास्त्र , योग शास्त्र , न्याय शास्त्र आदि सभी शास्त्रों पर शौवागामो का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है |

शिव और सावन सोमवार

यजुर्वेद का शत रुद्रिय अध्याय , तैतिरीय आरण्यक - श्वेताश्वेतरोप - निषाद में शिव की परमेश्वर रूप में आराधना  अर्चना की गयी है | पर शिव से कई रूपों में पशु पति का स्वरूप यहाँ निर्दिष्ट नहीं है | पशुव्रत पशु और पाश आदि परिभाषित शब्दों का उल्लेख सर्वप्रथम अथवर्शिरस उपनिषद् में प्राप्त होता है |
                                       कापालिक और पाशुपत :-
महाभारत में महेश्वरो के चार मत बतलाये है - शैव , पाशुपत , काल , दमन और कापालिक | इन चारो सम्प्रदायों के मूल ग्रंथो को शैवागम कहा जाता है | कापालिक साधना के रोमांचकारी रस रहस्य पूर्ण किस्से आम जनता में खूब चर्चित है | कापालिक साधना का अपना एक स्वतन्त्र दर्शन और स्वतंत्र मनोविज्ञान है |
                                                                                कापालिको के बारे में कहा जाता है की हर कापालिक छह मुद्रिकाओ का जानकार होता है | ये छह मुद्रिकाए है - कंठहार , आभूषण , कर्णभूषण, चूड़ामणि , भस्म और यज्ञोपवित | गूढार्थ में ये क्रियाए मनुष्य की आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक प्रवृतियों को चिन्हित करने के वाली मिथकीय साधना है | जिसे विकृत प्रतिको से प्रकट करना हमारी शिच का दरिद्र नमूना नहीं तो और क्या है |
                                                        पशुपति :-
चित्त द्वारा पशु और पति के संयोग को योग कहते है | इसे पति को प्राप्त करने वाले मार्ग को विधि कहा जाता है | साधक को पति पूजा के समय हसना गाना नाचना और विचित्र स्तर निकालना विधि के विधान माने गए है  | दुखो की अत्यधिक निवृति यानि दुखो का एकदम छुट जाना ही दुखांत या मोक्ष है | कुल मिलाकर पाशुपत मत पर कापालिको की सोच का बहुत ज्यादा असर देखने को मिलता है | शैव सिद्धांत सम्मत मूल ग्रन्थ तमिल भाषा में लिखे गए है | इसमें पति पशु और पाश इन तीन तत्वों को माना गया है |  पति का आशय इश्वर है , पशु का अर्थ जीव ( वह अज्ञ और अणु है ) पाश चार प्रकार के मूल कर्म , माया और रोध शक्ति | यही जीव की मुक्तावस्था भी कही जाती है | कश्मीर शैव मत बहुत हद तक अद्वेत वाद  से प्रभावित है |
                                                     शैवागम :-
शैव मत के पर्तिपदक शास्त्र जिन्हें शैवागम कहा जाता है | उपागमो सहित इनकी संख्या करीब दो सौ है इनकी रचना सातवी सदी ईशा पूर्व हो चुकी है | अनुश्रुति के अनुसार शैवागामो का महत्त्व निगम और अर्थश्रुती से कम नहीं है | यह निर्तिवाद  सत्य है की शौव उपासना का हमारे जन जीवन पर व्यापक असर पड़ा है | शेवागामो से प्रेरणा ग्रहण करके कालिदास ने अपने तीनो नाटको के मंगल श्लोक लिखे है | नाटक , नृत्य , शिल्प , वाश्तु वित्त , संगीत शब्द शास्त्र , योग शास्त्र , न्याय शास्त्र आदि सभी शास्त्रों पर शौवागामो का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है |मध्य युग में उत्तरार्ध तक आते आते निगम और आगम एक से स्वत : प्रामान्य युक्त हो गया है | शैवागामो  के अनुसार ३६ तत्व है | २४ तत्व सांख्य के अनुसार होते है | इनके आलावा ७ मिश्र तत्व होते है | 
१. काल    २. नियति         ३. कला        ४. विद्या        ५. राग        ६. अशुक्र माया             ७. प्रकृति माया है |
  पांच शुद्ध तत्व है - १. शिव   २. शक्ति     ३. सदाशक्ति          ४. ईश्वर        ५. शुद्ध विद्या | 
इस तरह कुल ३६ तत्वों का शैवागम गिनती करवाते है | 
अंतत: कहा जा सकता है की रूद्र की विध्वंसक सहर्ता और भुत भावन भगवान शंकर  की विकराल छवि के स्थान पर मंगल एवं कल्याणकारी शिव का विग्रह ही लोक मानस के मन में  प्रतिष्ठित हुआ है | देवो के देव महादेव शिव की पूजा अर्चना हमारी संस्कृति साहित्य और साधना ने की है | 
              वेदोक्ति है की भैरव शिव शिव भैरव अर्थात भैरव ही शिव है | इस तत्व में कोई भेद नहीं है | भगवान भैरव के बारे में कहा गया है की भैरव पूर्ण रूपों ही शंकस्य परात्मन | शिव पुराण में भी भैरव को परमात्मा शिव का ही रूप बनाया गया है | पौराणिक कथा के अनुसार जब सुमेरु पर्वत पर सभी देवताओ ने ब्रम्हा जी से पूछा- हे परम पिता इस चराचर जगत में अविनाशी कौन है और जिनका आदि और अंत किसी  को भी पता न हो ऐसे देव के बारे में हम देवताओ को बताने का कष्ट करे | इस पर ब्रम्हा जी ने कहा की इस चराचर जगत में अविनाशी तो केवल में ही हु | इस पर विष्णु देव ने कहा की इस संसार का भरण पोषण में करता हु इसीलिए परम शक्तिमान में हु | इसकी सत्यता सिद्ध करने के लिए चारो वेदों को बुलाया गया | वे कहने लगे की जिनके भीतर भुत , भविष्य , वर्त्तमान निहित है , जिनका आदि और अंत नहीं है , जो अजन्मा है , वे तो परम शक्तिमान भगवान रूद्र ही है | इस पर ब्रम्हा जी के पांचवे सिर ने भगवान शिव और माता पार्वती के बारे में कुछ अपमान जनक बाते कही जिससे चारो वेद अत्यंत दुखी हुए | इस समय दिव्य ज्योति के रूप में भगवान रूद्र प्रकट हुए , जिसे देख ब्रम्हा जी ने कहा की हे चन्द्र शंक , तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो और अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम रूद्र रखा है | अत: तुम मेरी सेवा में आ जाओ | ब्रम्हा जी की इस वाणी से क्रोधित होकर ब्रम्हा जी ने भेरव नामक पुरुष उत्पन्न किया और कहा की तुम ब्रम्हा पर शासन करो | पापभक्षण  करने के कारण भक्त तुम्हे पापभक्षक के नाम से भी जानेगे भेरव ने अपने बाये हाथ की सबसे छोटी पांचवी अंगुली के नख से ब्रम्हा जी का सिर काट लिया , जिसके कारण इन्हें ब्रम्हा हत्या के पाप से गुजरना पड़ा | शिव लोक कशी में इन्हें ब्रम्ह हत्या से मुक्ति मिली | जहा पर आज भी कपाल मोचन तीर्थ है | भगवान शिव ने इन्हें कशी का कोतवाल नियुक्त किया इसके साथ ही भुत प्रेत , पिशांच , ब्रम्ह राक्षस , बेताल , उच्चाटन , विदवेषण, से इनको अपने भक्तो की रक्षा के लिए इनका अधिकारी नियुक्त किया | आज भी इनके भक्त इस तरह की परेशानियों से बचने के लिए इनकी पूजा आराधना करते है |तांत्रिक जगत में इन्ही की आराधना विशेष तौर से की   जाती है | भगवान भैरव  शिव के पांचवे अवतार माने जाते है | इनका अवतरण मार्ग शीश कृष्णअष्टमी को हुआ है | इस दिन इनकी पूजा से ब्रम्ह हत्या से मुक्ति मिल जाती है |" यथा कामं तथा ध्यानं कारयेत साधकोतम: " अर्थात जैसा कार्य हो , साधक को वैसा ही ध्यान करना चाहिए | इनकी श्रद्धा और विश्वास से की गयी उपासना भक्तो को दैहिक , दैविक , भौतिक पापो से मुक्ति दिलाती है | 

शनिवार, 31 मार्च 2012

12 ज्योतिर्लिंग: 12 ज्योतिर्लिंग

12 ज्योतिर्लिंग: 12 ज्योतिर्लिंग: भगवान शिव के समस्त भारत में 12 ज्योतिर्लिंग मुख्य हैं. जो निम्न हैं : सौराष्ट्र प्रदेश अर्थात काठियावाड़ में श्रीसोमनाथ ज्योतिर्लिंग. श्री...

आराध्य देव की उपासना: आराध्य देव की उपासना

आराध्य देव की उपासना: आराध्य देव की उपासना: शास्त्रों की मान्यता है की व्यक्ति अपने आराध्य देव की पूजा नियमित और श्रद्धा भाव से करते है , उन पर प्रतिकूल ग्रहों का प्रभाव कम पड़ता है |...
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According to the Mahabharat Shukracharya was not only the lord of wealth but he is also the master of the medicinal herbs, the mantras and all kinds of taste. His capabilities are wonderful. He had donated all his wealth to the demons and had accepted the life of a hermit. By the inspiration of lord Brahma he became a planet and started to protect the lives of all the living beings of all the three worlds. In his form of a planet he attends the assembly of lord Brahma. 
When Venus is malefic, the use of Venus yantra/Shukra yantra is very benefic and favourable. Shukra yantra is kept on rising Moon Friday. Venus Yantra bestows respect, love of opposite sex and peace of mind