यजुर्वेद का शत रुद्रिय अध्याय , तैतिरीय आरण्यक - श्वेताश्वेतरोप - निषाद में शिव की परमेश्वर रूप में आराधना अर्चना की गयी है | पर शिव से कई रूपों में पशु पति का स्वरूप यहाँ निर्दिष्ट नहीं है | पशुव्रत पशु और पाश आदि परिभाषित शब्दों का उल्लेख सर्वप्रथम अथवर्शिरस उपनिषद् में प्राप्त होता है |
कापालिक और पाशुपत :-
महाभारत में महेश्वरो के चार मत बतलाये है - शैव , पाशुपत , काल , दमन और कापालिक | इन चारो सम्प्रदायों के मूल ग्रंथो को शैवागम कहा जाता है | कापालिक साधना के रोमांचकारी रस रहस्य पूर्ण किस्से आम जनता में खूब चर्चित है | कापालिक साधना का अपना एक स्वतन्त्र दर्शन और स्वतंत्र मनोविज्ञान है |
कापालिको के बारे में कहा जाता है की हर कापालिक छह मुद्रिकाओ का जानकार होता है | ये छह मुद्रिकाए है - कंठहार , आभूषण , कर्णभूषण, चूड़ामणि , भस्म और यज्ञोपवित | गूढार्थ में ये क्रियाए मनुष्य की आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक प्रवृतियों को चिन्हित करने के वाली मिथकीय साधना है | जिसे विकृत प्रतिको से प्रकट करना हमारी शिच का दरिद्र नमूना नहीं तो और क्या है |
पशुपति :-
चित्त द्वारा पशु और पति के संयोग को योग कहते है | इसे पति को प्राप्त करने वाले मार्ग को विधि कहा जाता है | साधक को पति पूजा के समय हसना गाना नाचना और विचित्र स्तर निकालना विधि के विधान माने गए है | दुखो की अत्यधिक निवृति यानि दुखो का एकदम छुट जाना ही दुखांत या मोक्ष है | कुल मिलाकर पाशुपत मत पर कापालिको की सोच का बहुत ज्यादा असर देखने को मिलता है | शैव सिद्धांत सम्मत मूल ग्रन्थ तमिल भाषा में लिखे गए है | इसमें पति पशु और पाश इन तीन तत्वों को माना गया है | पति का आशय इश्वर है , पशु का अर्थ जीव ( वह अज्ञ और अणु है ) पाश चार प्रकार के मूल कर्म , माया और रोध शक्ति | यही जीव की मुक्तावस्था भी कही जाती है | कश्मीर शैव मत बहुत हद तक अद्वेत वाद से प्रभावित है |
शैवागम :-
शैव मत के पर्तिपदक शास्त्र जिन्हें शैवागम कहा जाता है | उपागमो सहित इनकी संख्या करीब दो सौ है इनकी रचना सातवी सदी ईशा पूर्व हो चुकी है | अनुश्रुति के अनुसार शैवागामो का महत्त्व निगम और अर्थश्रुती से कम नहीं है | यह निर्तिवाद सत्य है की शौव उपासना का हमारे जन जीवन पर व्यापक असर पड़ा है | शेवागामो से प्रेरणा ग्रहण करके कालिदास ने अपने तीनो नाटको के मंगल श्लोक लिखे है | नाटक , नृत्य , शिल्प , वाश्तु वित्त , संगीत शब्द शास्त्र , योग शास्त्र , न्याय शास्त्र आदि सभी शास्त्रों पर शौवागामो का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है |
कापालिक और पाशुपत :-
महाभारत में महेश्वरो के चार मत बतलाये है - शैव , पाशुपत , काल , दमन और कापालिक | इन चारो सम्प्रदायों के मूल ग्रंथो को शैवागम कहा जाता है | कापालिक साधना के रोमांचकारी रस रहस्य पूर्ण किस्से आम जनता में खूब चर्चित है | कापालिक साधना का अपना एक स्वतन्त्र दर्शन और स्वतंत्र मनोविज्ञान है |
कापालिको के बारे में कहा जाता है की हर कापालिक छह मुद्रिकाओ का जानकार होता है | ये छह मुद्रिकाए है - कंठहार , आभूषण , कर्णभूषण, चूड़ामणि , भस्म और यज्ञोपवित | गूढार्थ में ये क्रियाए मनुष्य की आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक प्रवृतियों को चिन्हित करने के वाली मिथकीय साधना है | जिसे विकृत प्रतिको से प्रकट करना हमारी शिच का दरिद्र नमूना नहीं तो और क्या है |
पशुपति :-
चित्त द्वारा पशु और पति के संयोग को योग कहते है | इसे पति को प्राप्त करने वाले मार्ग को विधि कहा जाता है | साधक को पति पूजा के समय हसना गाना नाचना और विचित्र स्तर निकालना विधि के विधान माने गए है | दुखो की अत्यधिक निवृति यानि दुखो का एकदम छुट जाना ही दुखांत या मोक्ष है | कुल मिलाकर पाशुपत मत पर कापालिको की सोच का बहुत ज्यादा असर देखने को मिलता है | शैव सिद्धांत सम्मत मूल ग्रन्थ तमिल भाषा में लिखे गए है | इसमें पति पशु और पाश इन तीन तत्वों को माना गया है | पति का आशय इश्वर है , पशु का अर्थ जीव ( वह अज्ञ और अणु है ) पाश चार प्रकार के मूल कर्म , माया और रोध शक्ति | यही जीव की मुक्तावस्था भी कही जाती है | कश्मीर शैव मत बहुत हद तक अद्वेत वाद से प्रभावित है |
शैवागम :-
शैव मत के पर्तिपदक शास्त्र जिन्हें शैवागम कहा जाता है | उपागमो सहित इनकी संख्या करीब दो सौ है इनकी रचना सातवी सदी ईशा पूर्व हो चुकी है | अनुश्रुति के अनुसार शैवागामो का महत्त्व निगम और अर्थश्रुती से कम नहीं है | यह निर्तिवाद सत्य है की शौव उपासना का हमारे जन जीवन पर व्यापक असर पड़ा है | शेवागामो से प्रेरणा ग्रहण करके कालिदास ने अपने तीनो नाटको के मंगल श्लोक लिखे है | नाटक , नृत्य , शिल्प , वाश्तु वित्त , संगीत शब्द शास्त्र , योग शास्त्र , न्याय शास्त्र आदि सभी शास्त्रों पर शौवागामो का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है |
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