शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

महाशिवरात्रि पर्व


महाशिवरात्रि व्रत कथा :

महाशिवरात्रि का व्रत फाल्गुन महीने में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को रखा जाता है । इस दिन भगवान भोलेनाथ का कालेश्वर रूप प्रकट हुआ था. महाकालेश्वर शिव की वह शक्ति हैं जो सृष्टि के अंत के समय प्रदोष काल में अपनी तीसरी नेत्र की ज्वाला से सृष्टि का अंत करता हैं। महादेव चिता की भष्म लगाते हैं, गले में रूद्राक्ष धारण करते हैं और नंदी बैल की सवारी करते हैं. भूत, प्रेत, पिशाच शिव के अनुचर हैं. ऐसा अमंगल रूप धारण करने पर भी महादेव अत्यंत भोले और कृपालु हैं जिन्हें भक्ति सहित एक बार पुकारा जाय तो वह भक्त की हर संकट को दूर कर देते हैं. महाशिवरात्रि की कथा में शिव के इसी दयालु और कृपालु स्वभाव का परिचय मिलता है.
  एक शिकारी था. शिकारी शिकार करके अपना तथा अपने परिवार का भरण पोषण करता था.एक दिन की बात है शिकारी पूरे दिन भूखा प्यासा शिकार की तलाश में भटकता रहा परंतु कोई शिकार हाथ न लगा. शाम होने को आई तो वह एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर बैठ गया. वह जिस पेड़ पर बैठा था उस वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग था. रात्रि में व्याधा अपना धनुष वाण लिए शिकार की तलाश में बैठा था और उसे शिकार भी मिला परंतु निरीह जीव की बातें सुनकर वह उन्हें जाने देता. चिंतित अवस्था में वह बेल की पत्तियां तोड़ तोड़ कर नीचे फेंकता जाता. जब सुबह होने को आई तभी शिव जी माता पार्वती के साथ उस शिवलिंग से प्रकट होकर शिकारी से बोले आज शिवरात्रि का व्रत था और तुमने पूरी रात जागकर विल्वपत्र अर्पण करते हुए व्रत का पालन किया है इसलिए आज तक तुमने जो भी शिकार किए हैं और निर्दोष जीवों की हत्या की है मैं उन पापों से तुम्हें मुक्त करता हूं और शिवलोक में तुम्हें स्थान देता हूं. इस तरह भगवान भोले नाथ की कृपा से उस व्याधा का परिवार सहित उद्धार हो गया.

महाशिवरात्रि महात्मय एवं व्रत विधान 

शिवरात्रि की बड़ी ही अनुपम महिमा है. जो शिवभक्त इस व्रत का पालन करते हैं उन्हें चाहिए कि फाल्गुन कष्ण पक्ष की चतुदर्शी  यानी शिवरात्रि के दिन प्रात: उठकर स्नान करें फिर माथे पर भष्म  चंदन का तिलक लगाएं. हाथ में अक्षत, फूल, मु्द्रा और जल लेकर शिवरात्रि व्रत  का संकल्प करें. गले में रूद्राक्ष धारण करके शिवलिंग के समीप ध्यान की मुद्रा में बैठकर भगवान शिव का ध्यान करें। शांतचित्त होकर भोलेनाथ का गंगा जल से जलाभिषेक करें. महादेव को दुग्ध स्नान बहुत ही पसंद है अत: दूध से अभिषेक करें. महादेव को फूल, अक्षत, दुर्वा, धतूरा, बेलपत्र अर्पण करें। शिव जी को उक्त पदार्थ अर्पित करने के बाद हाथ जोड़ कर प्रार्थना करें.
शिवरात्रि के दिन रूद्राष्टक  और शिवपुराण  का पाठ सुनें और सुनाएं.और ॐ नमः शिवाय का जाप करे.  रात्रि में जागरण करके नीलकंठ कैलशपति का भजन और गुणगान करना चाहिए. अगले दिन भोले शंकर की पूजा करने के बाद पारण कर अन्न जल ग्रहण करना चाहिए. इस प्रकार महाशिवरात्रि का व्रत करने से शिव सानिघ्य प्राप्त होता है.इस दिन रुद्राभिषेक करना विशेष फलदायक है 
शिवरात्रि का रहस्य 
चतुर्दसी की रात्रि शिव करोडो सूर्यो के सामान प्रभाव लेकर लिंग रूप में प्रकट हुए चंद्रमा सूर्य के पास होता है ।सूर्य शनि की राशी कुम्भ में है । जीवन रूपी चंद्रमा शिव रूपी सूर्य के साथ शनि की कुम्भ राशी में योग मिलन होता है यही शिवरात्रि का रहस्य है ।
पूजन रात्रि में ही क्यों 
 शिव संहार शक्ति और तमो गुण के अधिष्ठाता है तमो रात्रि में उनका स्नेह प्राक्रतिक है रात्रि संहार काल की प्रतिनिधि है , सो जीवन में प्रकाश का संचार तथा तामशी प्रवृतियों का अंत करने के लिए शिव पूजा रात्रि में ही की जाती है ।

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